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संपादक
भोजराज सिंह पंवार
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बुधनी टाइम्स

रंगमंच पर जीवंत हुई कंचों और क्रांति की कहानी:शुजालपुर में दो नाटकों ने दर्शाया बाल राजा का खेल और भगत सिंह की शहादत

शुजालपुर में विश्व रंगमंच दिवस पर आयोजित दो दिवसीय नाट्य मंचन समारोह में दर्शकों को दो यादगार प्रस्तुतियां देखने को मिलीं। सोमवार को भूमिका नाट्य संस्था ने "राजा जो कंचे खेलता था" नाटक का मंचन किया। जवाहरलाल नेहरू स्नातकोत्तर महाविद्यालय के विज्ञान भवन में आयोजित इस नाटक का निर्देशन गोपाल दुबे ने किया। नाटक में विक्रमपुर के बाल राजा विवेक कीर्ति की कहानी प्रस्तुत की गई। राजा बनने के बाद भी वह खेल-कूद में रुचि रखता है। मवाना का राजा जब विक्रमपुर पर आक्रमण की योजना बनाता है, तो उसका सेनापति विवेक कीर्ति के साथ कंचे खेलने लगता है। बाद में मवाना का राजा खुद आता है और वह भी खेल से प्रभावित होकर युद्ध भूल जाता है। इससे पहले रविवार को मालवांश नाट्य संस्था ने "मैं रहूँ या न रहूँ" नाटक प्रस्तुत किया। जितेंद्र परमार के निर्देशन में यह नाटक शहीद भगत सिंह के जीवन पर आधारित था। नाटक में भगत सिंह के बचपन से लेकर उनकी शहादत तक की यात्रा को दिखाया गया। जलियांवाला बाग की घटना, सांडर्स हत्याकांड और अंत में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। वी केयर संस्था द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में दोनों नाटकों को दर्शकों का भरपूर प्यार मिला। रंगमंच प्रेमियों ने कलाकारों के प्रदर्शन की सराहना की।

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